Tuesday, September 27, 2022

 अवस्था त्रय और अवस्था त्रयातीत

मानवीय चेतना सामान्यतः तीन अवस्थाओ का अनुभव करती है; जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति।

जाग्रत अवस्थामे मनुष्य जागतिक संसार को अनुभव करता है, और शरीर जागतिक संसारमे कार्य करता रहेता है। मनुष्य के ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय एवं अंतःकरण चतुष्टय (चित्त, मन, बुद्धि, और अहंकार) अविरत कार्य करते है। इस अवस्थामे द्रष्टा, द्रश्य, और साधन ये तीन भेद रहते है। विषय वस्तु द्रश्य है, मन द्रष्टा है, और इंद्रिया साधन है। इस अवस्था मे चेतना का व्यापार स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर मे व्याप्त होता है। यही जाग्रत अवस्था के सतत कार्य के परिणाम स्वरूप मनुष्यका भौतिक शरीर (स्थूल शरीर) एवं सूक्ष्म शरीर (अंतःकरण) थक जाता है। इस अवस्था का अनुभव हर मनुष्य का अलग होता है।

मनुष्य जब निंद्रा को प्राप्त करता है तो उसका स्थूल शरीर तो स्थिर हो जाता है। स्थूल इंद्रिया विषयों को ग्रहण नहीं करती। परंतु, निंद्रा के समय स्वप्नमे उनका अंतःकरण कार्य करता है। मनुष्यके चित्तमे जो स्मृतिया और संस्कार है उसी का आश्रय लेकर मन एक स्वप्न सृष्टि बनाता है। मनुष्यके सूक्ष्म शरीर की सूक्ष्म इंद्रिया और अंतःकरण चतुष्टय से स्वप्न सृष्टि को अनुभव करता है और स्वप्न सृष्टि मे ही कार्य करता है। इस अवस्था मे चेतना का व्यापार मुख्य रूपसे सूक्ष्म शरीर मे व्याप्त होता है। उसी कारण जब कोई रातभर निंद्रा मे स्वप्न देखने के बाद सुबह जाग्रत होता है तो प्रसन्न अनुभूत नहीं करता, मन से थका महेसुस करता है। इस अवस्था का अनुभव भी जाग्रत अवस्था की तरह हर मनुष्य का अलग रहता है।

निंद्राके समय यदि मनुष्य सुषुप्ति (गाढ़ निंद्रा) को प्राप्त होता है तो उसका स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों का व्यापार शांत हो जाता है। इस अवस्थामे चेतना अपने कारण शरीरमे स्थित होती है। चित्त शांत होता है (निंद्रा को एक वृत्ति भगवान पतंजलि ने कहा है)। इस अवस्था मे चित्त अपने संस्कार को लिए हुए है। इस अवस्थामे मनुष्य को, समय और स्थल (देश), देशकाल (Time-Space) का ज्ञान नहीं रहेता। द्रश्य और द्रष्टा का अभेद हो जाता है। किन्तु यह अवस्था मे आत्मा का बोध नहीं होता। इस अवस्था का अनुभव हरेक मनुष्य का समान रहेता है। इस अवस्था मे इंद्रिय और अंतःकरण का व्यापर नहीं होने से स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीर को आराम मिलता है। इस लिए गाढ़ निद्रा से जगने के बाद मनुष्य प्रसन्नता अनुभव करता है।

सामान्य मनुष्य उपरोक्त तीन अवस्थाओ को अनुभव करता है। किन्तु इसके परे की अन्य दो अवस्था का अनुभव नहीं करता।   

ये तीनों अवस्था से परे की अवस्था जहा आत्मा का बोध है और जो तीनों अवस्था के व्यापर मे जो द्रष्टा है उनका बोध लिए हुए है इस अवस्था को तुरीय (चतुर्थ) अवस्था कहेते है। ये अवस्था को समाधि अवस्था भी कही बार कहेते है। इस अवस्था आनंद स्वरूप है और इस अवस्था मे द्वैत की अनुभूति बनी रहती है।

तुरीय अवस्था के परे की अवस्था जहा द्वैत नहीं रहता और जो परम शांति की अवस्था है उसे तुरियातीत अवस्था कहते है। इस अवस्था मे समय और स्थान (देश) की अनुभूति नहीं रहती (beyond time and space)। ये भी एक समाधि अवस्था ही है। 

Friday, June 24, 2022

51 मातृका

स्वर:    अ, आ, इ, ई, उ, ऊ  ऋ, ऋृ, लृ, लृृ, ए , ऐ , ओ, अं, अः  (कुल-16)

स्पर्श: (कुल - 25)

           क् वर्ग - क्, ख्, ग्, घ्, ङ 

           च् वर्ग - च्, छ्, ज्, झ्, ञ 

           ट् वर्ग - ट्, ठ्, ड्, ढ़्, ण 

           त् वर्ग - त्, थ्, द्, ध्, न् 

           प् वर्ग - प्, फ्, ब्, भ्, म् 

अंतस्थ - य् वर्ग - य् , र्, ल्, व्, ळ (कुल-5: ल् और ळ, ल् कार द्वय के साथ)

उष्माण  - श् वर्ग - श्, ष्, स्, ह्   (कुल-4)

कूटस्थ - क्ष कार (कुल - 1)

              कुल वर्ण : 16 + 25 + 5 + 4 + 1 = 51 

ऊपर के अंतस्थ, उष्माण, और कूटस्थ को एक व्यापक वर्ण नाम से भी व्यवहृत किया जाता है। 

इस तरह स्वर, स्पर्श, एवं व्यापकवर्ग सहित महामंत्र का स्वरूप त्रिखंडात्मक है। 

शिव-शक्ति सामरस्यात्मक को पर-शिव कहते है। पर-शिव से दो धाराए निकलती है, एक शिव और दूसरी शक्ति । 


मातृका महामंत्र शिव-शक्ति के स्वरूप का बोधक है, एवं श्रीचक्र महाशक्ति का प्रतिबिंब है जिसको यंत्र के रूपमे चित्रित किया है। चक्र का अर्थ है की प्रमेय, प्रमाण, एवं प्रमातृ रूप सकल भेद, अभेद, और उभय (दोनों - भेदाभेद) रूप शिव-शकत्यात्मक चित-चैत्य रूप जगत का प्रतिबिंबभूत नव चक्रात्मक श्रीचक्र श्रीमहात्रिपुरसुंदरी का शरीर है। 

ऐसा कहा भी जाता है "शिव-शक्तिमयं ज्ञेयं श्री चक्रं शिवयोर्वपुः"