स्वर: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ऋ, ऋृ, लृ, लृृ, ए , ऐ , ओ, अं, अः (कुल-16)
स्पर्श: (कुल - 25)
क् वर्ग - क्, ख्, ग्, घ्, ङ
च् वर्ग - च्, छ्, ज्, झ्, ञ
ट् वर्ग - ट्, ठ्, ड्, ढ़्, ण
त् वर्ग - त्, थ्, द्, ध्, न्
प् वर्ग - प्, फ्, ब्, भ्, म्
अंतस्थ - य् वर्ग - य् , र्, ल्, व्, ळ (कुल-5: ल् और ळ, ल् कार द्वय के साथ)
उष्माण - श् वर्ग - श्, ष्, स्, ह् (कुल-4)
कूटस्थ - क्ष कार (कुल - 1)
कुल वर्ण : 16 + 25 + 5 + 4 + 1 = 51
ऊपर के अंतस्थ, उष्माण, और कूटस्थ को एक व्यापक वर्ण नाम से भी व्यवहृत किया जाता है।
इस तरह स्वर, स्पर्श, एवं व्यापकवर्ग सहित महामंत्र का स्वरूप त्रिखंडात्मक है।शिव-शक्ति सामरस्यात्मक को पर-शिव कहते है। पर-शिव से दो धाराए निकलती है, एक शिव और दूसरी शक्ति ।
मातृका महामंत्र शिव-शक्ति के स्वरूप का बोधक है, एवं श्रीचक्र महाशक्ति का प्रतिबिंब है जिसको यंत्र के रूपमे चित्रित किया है। चक्र का अर्थ है की प्रमेय, प्रमाण, एवं प्रमातृ रूप सकल भेद, अभेद, और उभय (दोनों - भेदाभेद) रूप शिव-शकत्यात्मक चित-चैत्य रूप जगत का प्रतिबिंबभूत नव चक्रात्मक श्रीचक्र श्रीमहात्रिपुरसुंदरी का शरीर है।
ऐसा कहा भी जाता है "शिव-शक्तिमयं ज्ञेयं श्री चक्रं शिवयोर्वपुः"
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